Mon. Feb 24th, 2020

सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए जनहित याचिका

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देहरादून। भारतीय कानून ने आम जन की सुरक्षा के लिए सारे इंतजाम किए हुए हैं, लेकिन फिर भी कही न कही एक आम आदमी की सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह लग ही जाता है। फिर चाहे वह प्रशासनिक स्तर पर हो या फिर सरकारी। जब कानून बनाने वाले ही कानून का उल्लंघन करने लगे तो आम आदमी कहां जाए। शायद इसके लिए ही जनहित याचिका का प्रचलन शुरू हुआ है। आज समस्या चाहे वार्ड स्तर की हो या फिर जिला स्तर की, सरकार तो उस पर नजरे इनायत नही करती। छोटे-छोटे मामले में आम जन को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पडता है। यदि माननीय न्यायालय के आदेशो पर गौर करे तो स्वतः ज्ञात हो जाएगा कि जिन मामलों में सरकारी स्तर पर निर्णय देने चाहिए थे उन पर भी माननीय न्यायपालिका को दखल देना पडा है। फिर चाहे उच्च न्यायालय हो या फिर सर्वोच्च न्यायालय। सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर हो तो उससे सरकार भी समस्या का समाधान खोजने के लिए हाथ पैर मारने लगती है। कई मामले ऐसे भी सामने आए कि जब सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन न कर उसका तोड ढूंढने की कोशिश की। वैसे कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जनहित याचिका आम आदमी के अधिकारो को सुरक्षित करने में लाभकारी सिद्ध हो रही है। जनहित याचिका दायर करना बिल्कुल आसान है। बशर्त है इसके संबंध में ज्ञान होना चाहिए। इस लेख के माध्यम से यही ज्ञान प्रदान करने का एक छोटा सा प्रयास किया जा रहा है। यहां पर यह ध्यान देने की बात है कि जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी कानून में परिभाषित नहीं है, बल्कि यह उच्चतम न्यायालय के संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न है, जिसका कोई अंतर्राष्ट्रीय समतुल्य नहीं है और इसे एक विशिष्ट भारतीय संप्रल्य के रूप में देखा जाता है। यूं तो इस प्रकार की याचिकाओं का विचार सबसे पहले अमेरिका में जन्मा। जहां इसे सामाजिक कार्यवाही याचिका कहते हैं। यह न्यायपालिका का आविष्कार तथा न्यायधीश निर्मित विधि है। जबकि, भारत में जनहित याचिका पी-एन- भगवती ने प्रारंभ की थी। वास्तव में, ये जनहित याचिकाएं जनहित को सुरक्षित बनाना तथा बढ़ाना चाहती हैं। ये लोकहित भावना पर कार्य करती हैं। ये ऐसे न्यायिक उपकरण हैं जिनका लक्ष्य जनहित प्राप्त करना है। इनका लक्ष्य तीव्र तथा सस्ता न्याय एक आम आदमी को दिलवाना है, जिसके मद्देनजर कार्यपालिका व विधायिका को उनके संवैधानिक कार्य करवाने हेतु किया जाता है। ये समूह हित में काम आती है ना कि व्यत्तिफ हित में। यदि इनका दुरूपयोग किया जाये तो याचिकाकर्ता पर जुर्माना तक किया जा सकता है। हालांकि, इनको स्वीकारना या ना स्वीकारना न्यायालय के रुख पर निर्भर करता है।यहां पर यह बताना भी जरूरी है कि जनहित याचिकाओं की स्वीकृति हेतु उच्चतम न्यायालय ने कुछ नियम बनाये हैं- पहला, लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति या संगठन इन्हें ला सकता है। दूसरा, कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका माना जा सकता है। तीसरा, कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे। चतुर्थ, ये राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरूद्ध भी लायी जा सकती है।वहीं, इसके कई लाभ भी है-पहला, इस याचिका से जनता में स्वयं के अधिकारों तथा न्यायपालिका की भूमिका के बारे में चेतना बढ़ती है। यह मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को वृहद बनाती है जिसमें व्यक्ति को कई नये अधिकार मिल जाते हैं। दूसरा, यह कार्यपालिका व विधायिका को उनके संवैधानिक कर्तव्य करने के लिये बाधित करती है। साथ ही, यह भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की सुनिश्चित करती है। यह बात अलग है कि जनहित याचिकाओं की आलोचनाएं भी की जाती हैं और कहा जाता है कि ये सामान्य न्यायिक संचालन में बाधा डालती हैं और इनके दुरूपयोग की प्रवृति भी परवान पर है। यहां यह बता दें कि इसके चलते ही सुप्रीम कोर्ट ने खुद कुछ बन्धन इनके प्रयोग पर लगाये हैं।जहां तक जनहित याचिकाओं के इतिहास का सवाल है तो यहां पर यह स्पष्ट करना लाजिमी है कि जनहित याचिका नियमित न्यायिक चर्चाओं से भिन्न है। हालांकि, यह समकालीन भारतीय कानून व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। आरम्भ में भारतीय कानून व्यवस्था में इसे यह स्थान प्राप्त नहीं था। इसकी शुरुआत अचानक नहीं हुई, वरन कई राजनैतिक और न्यायिक कारणों से धीरे-धीरे इसका विकास हुआ। कहा जा सकता है कि 70 के दशक से शुरुआत होकर 80 के दशक में इसकी अवधारणा पक्की हो गयी थी। दरअसल, एके गोपालन और मद्रास राज्य (19-05-1950) केस में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद-21 का शाब्दिक व्याख्या करते हुए यह फैसला दिया कि अनुच्छेद 21 में व्याख्यित ‘विधिसम्मत प्रक्रिया’ का मतलब सिर्फ उस प्रक्रिया से है जो किसी विधान में लिखित हो और जिसे विधायिका द्वारा पारित किया गया हो। अर्थात, अगर भारतीय संसद ऐसा कानून बनाती है जो किसी व्यक्ति को उसके जीने के अधिकार से अतर्कसंगत तरीके से वंचित करता हो, तो वह मान्य होगा। तब न्यायालय ने यह भी माना कि अनुच्छेद-21 की विधिसम्मत प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय या तर्कसंगतता शामिल नहीं है। न्यायालय ने यह भी माना कि अमरीकी संविधान के उलट भारतीय संविधान में न्यायालय विधायिका से हर दृष्टिकोण में सर्वोच्च नहीं है और विधायिका अपने क्षेत्र (कानून बनाने) में सर्वोच्च है। इस फैसले की काफी आलोचना भी हुई, लेकिन यह निर्णय 25 साल से भी ज्यादा समय तक बना रहा। ये उच्चतम न्यायालय के आरंभिक वर्ष थे, जब इसका रुख सावधानीभरा और विधायिका समर्थक था। यह काल हर तरह से, आज के माहौल, जब न्यायिक समीक्षा की अवधारणा स्थापित हो चुकी है और न्यायालय को ऐसी संस्था के रूप में देखा जाता है जो नागरिकों को राहत प्रदान करता है और नीति-निर्माण भी करता है जिसका राज्य को पालन करना पड़ता है, से भिन्न था। हालांकि, बाद के फैसलों में न्यायालयों की सर्वोच्चता स्थापित हुई और इस बीच विधायिका और न्यायपालिका के बीच मतभेद और संघर्ष भी हुआ। खासकर गोलक नाथ और पंजाब राज्य (1967) केस में 11 जजों की खंडपीठ ने 6-5 के बहुमत से माना कि संसद ऐसा संविधान संशोधन पारित नहीं कर सकती जो मौलिक अधिकारों का हनन करता हो। वहीं, केशवानंद भारती और केरल राज्य (1973) केस में उच्चतम न्यायालय ने गोलक नाथ निर्णय को रद्द करते हुए यह दूरगामी सिद्धांत दिया कि संसद को यह अधिकार नहीं है कि वह संविधान की मौलिक संरचना को बदलने वाला संशोधन करे और यह भी माना कि न्यायिक समीक्षा मौलिक संरचना का भाग है। आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रता का जो हनन हुआ था, उसमें उच्चतम न्यायालय के एडीएम जबलपुर और अन्य तथा शिवकांत शुक्ला (1976) केस, जिसके फैसले में न्यायालय ने कार्यपालिका को नागरिक स्वतंत्रता और जीने के अधिकार को प्रभावित करने की स्वछंदता दी थी, का भी योगदान माना जाता है। इस फैसले ने अदालत के नागरिक स्वतंत्रता के संरक्षक होने की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। आपातकाल (1975-1977) के पश्चात न्यायालय के रुख में गुणात्मक बदलाव आया और इसके बाद जनहित याचिका के विकास को कुछ हद तक इस आलोचना की प्रतिक्रिया के रूप में देख सकते हैं। वहीं, मेनका गांधी और भारतीय संघ (1978) केस में न्यायालय ने एके गोपालन केस के निर्णय को पलट कर जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों को विस्तारित किया। जहां तक उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिकाओं को प्रगतिशील लोकतान्त्रिक व्यवस्था का प्राणतत्व माना है। साथ ही, और अनावश्यक याचिकाकर्ताओं को कड़ी चेतावनी और जुर्माना भी लगाया है, जिससे उसकी गम्भीरता का बोध होता है।जहां तक इसके दुरुपयोग और प्रणाली की समस्या का सवाल है तो इस बात में कोई दो राय नहीं कि जनहित याचिका के दुरुपयोग की संभावना हमेशा बनी रही है और कई मामलों की आलोचना भी हुई है। स्वयं उच्चतम न्यायालय ने एक केस के अवलोकन के मौके पर दो टूक कहा है कि अगर इसको सही तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया और इसके दुरुपयोग को न रोका गया तो यह अनैतिक हाथों द्वारा प्रचार, प्रतिशोध, निजी या राजनैतिक स्वार्थ का हथियार बन सकता है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायधीश केजी बालाकृष्णन ने 8 अक्टूबर 2008 को सिंगापुर लॉ अकादमी में दिये गये अपने भाषण में जनहित याचिका की अनिवार्यता दुहराते हुए यह भी माना कि जनहित याचिका के द्वारा न्यायालय मनमाने तरीके से विधायिका के नीतिगत फैसलों में दखल दे सकता है और ऐसे आदेश दे सकता है जिनका क्रियान्वयन कार्यपालिका के लिये कठिन हो और जिससे सरकार के अंगों के बीच के शक्ति संतुलन की अवहेलना हो।

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