Mon. Feb 24th, 2020

दर्द देता सिस्टम, अलग राज्य का लाभ क्या

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देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य गठन को 19 वर्ष पूरे हो चुके हैं। राज्य 20वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। 19 सालों में राज्य के सुदूर क्षेत्र में बैठे व्यक्ति ने क्या खोया, क्या पाया इस पर आत्म चिंतन करने की वास्तव में आवश्यकता है। क्योंकि 19 साल उस व्यक्ति के हाथ से रेत की भांति फिसल गए है जिसने ‘आज दो अभी दो, उत्तराखण्ड राज्य दो’ का नारा यह सोचकर लगाया था कि उसे अपने राज्य में मूलभूत सुविधाएं प्राप्त होगी। फिर चाहे इसमें बेहतर सडक मार्ग हो या फिर बेहतर चिकित्सा सुविधा। जो अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय उसे प्राप्त नही हुआ, वह उसे अपने राज्य में प्राप्त होगा। लेकिन 19 साल में उस व्यक्ति की समस्या जस की तस बनी रही। विकास हुआ तो उन तीन जिलांे का जो पहले से विकसित थे। फिर चाहे देहरादून, हरिद्वार हो या फिर उधमसिंहनगर। बाकि 10 जिले आज भी विकास की बाट जोह रहे है। सुदूर क्षेत्रो में क्या स्थिति है इसकी सच्चाई खोजे तो दो दिन पहले हुयी एक घटना सारी सच्चाई को आईने की तरह साफ कर देगी। हुआ यूं कि चमोली जिले किमाणा गांव में एक महिला चारा पत्ती काटते समय फिसलकर गिर गयी। घायल महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को 12 किलोमीटर का सफर पैदल ही बर्फीले रास्ते पर तय करना पडा। इसके बाद उसे वाहन से 40 किलोमीटर दूर गोपेश्वर स्थित जिला मुख्यालय पहुंचाया गया। जहां आज भी महिला का उपचार चल रहा है। आलम यह है कि इस गांव के लिए 10 साल पहले सडक स्वीकृत हुयी थी लेकिन अब तक सिर्फ रोड कटिंग का ही काम हो पाया है। जोशीमठ विकास खण्ड के किमाणा गांव की दूरी सडक से 12 किलोमीटर है। इस सडक ने उस घायल महिला को कितना दर्द दिया इसका आभास उसी को हो सकता है जो उस दर्द को सहन कर चुका है। गांव की गायत्री देवी जंगल से चारा पत्ती काटने यह सोचकर गयी थी कि वह अपने जानवरो का इस चारा पत्ती से पेट भरेगी लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था। आज वह सरकारी सिस्टम की लापरवाही का दर्द भुगत रही है। यदि 10साल पहले स्वीकृत हुयी सडक बन जाती तो शायद उसे बर्फीले रास्ते की दूरी दो गुने समय लगाकर तय न करनी पडती। महिला ने कितना दर्द सहन किया इसका अंदाजा लगाना हो तो घटना वाले दिन पर गौर करना होगा। रविवार को महिला पैर फिसलने से गिर गयी थी। किसी तरह रात बिताने के बाद ग्रामीण सोमवार की सुबह घायल को कुर्सी पर बैठकार चिकित्सालय के लिए रवाना हुए। छह घंटे के बाद वह लंगसी नाम के स्थान पर पहुंचे वहां वाहन बुक कर घायल को अस्पताल पहुंचाया गया। बर्फबारी के कारण पैदल मार्ग भी जानलेवा बना हुआ था। जोशीमठ की उर्गम घाटी के इस गांव के लिए सडक स्वीकृत है लेकिन 10 साल बाद भी इस पर काम न शुरू होना सरकारी सिस्टम की घोर लापरवाही को उजागर करता है। अब बडा सवाल यह उठता है कि आखिर क्या यह स्थान उत्तराखण्ड में नही है। यदि है तो देहरादून में बैठी सरकार को आम जन का दर्द क्यों दिखायी नही देता। क्या भाजपा सरकार इतनी निष्ठुर हो गयी है कि उसे आम जन के दर्द से कोई सरोकार नही। रातो रात सडको का जाल बिछाने का दावा करने वाली सरकार 12 किलोमीटर की सडक बनाने में असफल क्यो हो रही है। इस क्षेत्र के लोगो ने क्या भाजपा को वोट नही दिया। वोट चाहे भाजपा को दिया हो या कांग्रेस को लेकर मतदाता तो उत्तराखण्ड के ही हैं। आखिर उनकी उपेक्षा क्यो। आखिर पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी उस आदमी को क्या मिला जिसे यह उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद उसे बेहतर चिकित्सा, सडक, शिक्षा, रोजगार प्राप्त होगा। उसे तो इनमें से कुछ भी नही मिला। जबकि यह सभी चीजे मूलभूत आवश्यकता मंे शामिल है। बेहतर चिकित्सा प्रदान करना सरकार का नैतिक दायित्व है।

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