Mon. Feb 24th, 2020

आप की जीत : उत्तराखंड में भाजपा चौकस

1 min read

देहरादून। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की शानदार जीत से प्रदेश के भाजपाइयों के चेहरे का रंग उतर गया है। इस बार वे दिल्ली की चुनावी जंग में उलटफेर के मंसूबे पाले बैठे थे। प्रदेश सरकार के कुछ मंत्रियों, पदाधिकारियों व नेताओं को भी दिल्ली में प्रचार में उतारा गया था। लेकिन उनके प्रयास भाजपा को करारी शिकस्त नहीं बचा पाए। भाजपा की इस हार ने उत्तराखंड भाजपा को भी चौकन्ना कर दिया है। हालांकि उसके नेता दावा कर रहे हैं कि उत्तराखंड की सियासत में इस हार का कोई असर नहीं होगा। लेकिन अंदरखाने वे हार से विचलित नजर आए। वे यह उम्मीद कर रहे थे कि इस बार भाजपा की स्थिति पहले से सुधरेगी। लेकिन नतीजे कुछ और ही बयान करते रहे और नेताओं के चेहरे की मायूसी और अधिक घनी होती रही। प्रदेश भर जुटे जिलाध्यक्षों, जिला संयोजकों और जिला प्रभारियों ने भी पार्टी की पराजय पर चुप्पी साधे रखी। भाजपा के नेताओं का केवल यहीं कहना था की दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों का उत्तराखंड की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वहां के मुद्दे अलग थे। जब आम आदमी पार्टी की सरकार मुफ्त बिजली और पानी नहीं दे पाएगी, तो लोगों को सच्चाई पता चल जाएगी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपेक्षा के मुताबिक नतीजे न मिलने से अब उत्तराखंड में भी भाजपा सतर्क हो गई है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए हालांकि अभी दो साल का वक्त है, लेकिन सूबे के मतदाताओं के मिजाज के लिहाज से पार्टी किसी तरह का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती। यही वह वजह है जिसने भाजपा नेतृत्व को अभी से चिंतन के लिए बाध्य कर दिया है। पिछले साल ही लोकसभा चुनाव में सातों सीटों पर जीत दर्ज करने के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा। अब अगर उत्तराखंड में देखा जाए तो भाजपा ने पिछले दो लोकसभा चुनावों में पांचों सीटों पर जीत दर्ज की। यही नहीं, तीन साल पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा को उत्तराखंड में तीन-चौथाई से अधिक बहुमत हासिल हुआ। इस सबके बावजूद भाजपा चिंतित है, क्योंकि उत्तराखंड की जनता का मिजाज हमेशा बदलाव वाला रहा है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद से अब तक हुए चार विस चुनाव में यहां हर बार सत्ता परिवर्तन हुआ है। नौ नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड अलग राज्य बना, उस वक्त उत्तर प्रदेश में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा व विधान परिषद के 30 सदस्यों को लेकर राज्य की पहली अंतरिम विधानसभा का गठन किया गया और सरकार भाजपा की बनी। महज डेढ़ साल बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में मतदाता ने भाजपा को सत्ता से बेदखल करते हुए कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया। वर्ष 2007 के दूसरे विस चुनाव में जनादेश मिला भाजपा को। यही परिपाटी वर्ष 2012 के तीसरे चुनाव में भी नजर आई, जब भाजपा को दरकिनार कर एक बार फिर कांग्रेस को जनता ने सत्ता तक पहुंचा दिया। वर्ष 2017 के चौथे विधानसभा चुनाव में फिर मतदाता ने कांग्रेस को दरकिनार कर भाजपा को 70 में से 57 सीटें दे दी। भाजपा की चिंता इसलिए भी वाजिब है, क्योंकि पिछले कुछ समय के दौरान हुए अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को आशानुरूप कामयाबी नहीं मिली। इसके विपरीत लोकसभा चुनावों में इन राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन खासा बेहतर रहा। कांग्रेस वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी की आस बांधे हुए है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत पर अरविंद केजरीवाल को हार्दिक बधाई दी। यही नहीं उन्होंने मनीष सिसोदिया को अत्यधिक सक्षम उप मुख्यमंत्री करार देते हुए कहा कि सिसोदिया की जीत काम करने वालों के लिए बड़ी राहत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *