Mon. Feb 24th, 2020

होगा मंत्री मंडल विस्तार या बदले जायेंगे सीएम

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देहरादून। होगा मंत्री मण्डल विस्तार या बदले जायेंगे सूबे के मुखिया! यह एक ऐसा सवाल है जो उत्तराखण्ड के सत्ता के गलियारे में चर्चाओ में बना हुआ है। इस सवाल का जवाब तलाशने की हम कोशिश कर रहे हैं। उत्तराखण्ड उस राज्य का नाम है जहां पं. नारायण दत्त तिवारी को छोडकर कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल तक लगातार नही टिका। फिर चाहे अंतरिम सरकार में प्रथम मुख्यमंत्री रहे नित्यानंद स्वामी की बात हो या फिर भाजपा के लिए जरूरी रहने वाले भुवन चंद्र खण्डूडी की या फिर कांग्रेस सरकार मंे हरीश रावत की। सभी कुछ-कुछ साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन रहे और फिर हाईकमान के निर्देश पर नेतृत्व परिवर्तन होता चला गया। पहले बात करते हैं उत्तराखण्ड राज्य के मुख्यमंत्रियों की। 9 नवम्बर 2000 को राज्य अस्तित्व में आया। अंतरिम सरकार के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य भाजपा के वरिष्ठ नेता नित्यानंद स्वामी को मिला। लेकिन वह कुछ समय तक ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन रहे। अंदरूनी कलह के चलते मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भगत सिंह कोश्यारी को बैठाना पडा उनका कार्यकाल लम्बा न खींच सकता और वर्ष 2002 मे प्रथम विधानसभा चुनाव हुए। सत्ता भाजपा के हाथ से निकलकर कांग्रेस के हाथो में चली गयी। कांग्रेस पार्टी ने अपने सबसे वरिष्ठ नेता पं. नारायण दत्त तिवारी के हाथो में उत्तराखण्ड की कमान सौंप दी। उन्होने पांच साल तक राज्य में राज किया। हालांकि उनका कार्यकाल भी आज जाऊं, कल जाऊ के सहारे चलता रहा। हरीश रावत समय-समय पर परेशानी मे डाल देते थे। जैसे तैसे उन्होने अपने पांच साल पूरे किए। वर्ष 2007 में द्वितीय बार विधानसभा चुनाव हुए। जनता ने कांग्रेस को नकार कर सूबे की कमान भाजपा के हाथो में दी। भाजपा हाईकमान ने मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूडी को उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन नित्यानंद स्वामी की कलाह उनके कार्यकाल में भी अंदरूनी कलह चरम पर पहुंच गया जिसके चलते हाईकमान को सत्ता परिवर्तन करना पडा और सूबे की कमान डा. रमेश पोखरियाल निशंक के हाथो में सौंपी पडी। डा. निशंक मुख्यमंत्री तो बने लेकिन वह भी अपना कार्यकाल पूरा नही कर पाए और सत्ता दोबारा भुवन चंद्र खण्डूडी के हाथो में आ गयी। उनके नेतृत्व मंे ही वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव हुआ। इन चुनावो में खण्डूडी हैं जरूरी का नारा दिया गया। यह बात अलग रही कि भुवन चंद्र खण्डूडी स्वयं चुनाव हार गए। भाजपा की विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार हुयी और सत्ता कांग्रेस के हाथो में चली गयी। इस बार फिर कांग्रेस पार्टी ने हरीश रावत के स्थान पर विजय बहुगुणा को सूबे का मुख्यमंत्री बना दिया जिससे रावत गुट नाराज हो गया। हरीश रावत अपने समर्थक विधायको को लेकर दिल्ली में जम गए। विजय बहुगुणा ने जैसे तैसे अपना कार्यकाल शुरू किया तो उनकी भी पं. तिवारी की तरह घेराबंदी होने लगी। हालात उस समय विकट हो गए जब केदारनाथ मंे आपदा आयी और सरकार स्थिति को संभालने में नाकाम रही। केदारनाथ की आपदा विजय बहुगुणा की कुर्सी ले गयी। हाईकमान ने नेतृत्व परिवर्तन करते हुए हरीश रावत को सूबे का मुखिया बनाया लेकिन एक स्ट्रिंग ने उनकी राजनीति को हिला दिया। वर्ष 2017 में सूबे में चुनाव हुए और कांग्रेस दोबारा सत्ता में नही आ पायी। इस बार जनता ने भाजपा पर विश्वास जताया तथा मोदी के नाम पर भाजपा सूबे की सत्ता पर काबिज होने पर सफल रही। भाजपा हाईकमान ने संघ के निकट रहने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सुशोभित कर दिया। त्रिवेंद्र रावत सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति को लेकर आगे बढ रही है। रावत सरकार को तीन साल पूरे होने जा रहे हैं लेकिन वह भी गुटबाजी से पार पाने में नाकाम साबित हो रहे है। सूबे में सरकार चल रही है ऐसी अनुभूति आम जन को नही हो पा रही। भाजपा सरकार मैदानी जिलो में ही सिमट कर रह गयी। जिसके कारण सत्ता के गलियारे में यह बात जोर शोर से उड रही है कि जल्द ही सूबे में नेतृत्व परिवर्तन होने वाला है। वैसे कहा तो यह जा रहा था कि जल्द ही रावत सरकार मे रिक्त चल रहे तीन मंत्रियो के पद भरे जायेंगे। जब से सूबे की कमान त्रिवेंद्र सिंह रावत के हाथो में गयी तभी से दो मंत्रियो के पद रिक्त चल रहे हैं। तीसरा मंत्री पद प्रकाश पंत के निधन से खाली हुआ था जो आज तक रिक्त है। इस तरह तीन मंत्री पद रिक्त चल रहे है। वैसे यह पद 26 जनवरी के बाद भरने का दावा किया जा रहा था लेकिन दिल्ली चुनाव ने मंत्री मण्डल विस्तार को टाल दिया अब सत्ता में चर्चा है कि दिल्ली चुनाव के बाद तीन विधायको की मंत्रीपद पर ताजपोशी की जाएगी। लेकिन क्या वास्तव में यह ताजपोशी हो जाएगी। कही ऐसा न हो कि मंत्रीमण्डल विस्तार से पहले ही मुख्यमंत्री बदल जायें। जो चर्चा है उसके अनुसार मुख्यमंत्री बनने की दौड में सबसे आगे डा. रमेश पोखरियाल निशंक का नाम है। इसके बाद सतपाल जी महाराज भी दौड में शामिल हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि सूबे में मंत्रीमण्डल विस्तार होता है या फिर मुखिया का चेहरा बदल जाएगा। जो भी हो उत्तराखण्ड की राजनीति देहरादून से लेकर दिल्ली तक  चर्चा का विषय बनी हुयी है।

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