Mon. Feb 24th, 2020

निगम की जल्दबाजी पर भी श्रेय लेने की होड

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देहरादून। राजनीति में जो कुछ न हो जाए वो भला। कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है नगर निगम की राजनीति में। देहरादून का नगर निगम उत्तराखण्ड राज्य के आठ नगर निगमो में से सबसे पुराना है। वर्ष 2003 में नगर पालिका से नगर निगम अस्तित्व में आया था लेकिन आज नगर निगम के अविवेकपूर्ण निणर्यो से यह हंसी का पात्र बनता जा रहा है। जल्दबाजी में लिए गए निर्णय विपक्ष को हावि होने का मौका दे रहे हैं। कमाल की बात तो यह है कि छोटी सरकार के मुखिया बडी सरकार के मुखिया के करीबी माने जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद जल्दबाजी में निर्णय लेना उनकी राजनीतिक पैठ पर भट्टा बैठा रहा है। छोटी सरकार के मुखिया आखिर निर्णय लेने में क्यो जल्दबाजी करते हैं यह तो वह ही बेहतर जानते हैं मगर इतना है कि कई बार जल्दबाजी भारी पड जाती है। राजनीति में तो जल्दबाजी का कोई स्थान नही। जो व्यक्ति धीरे चलता है वह ही राजनीति में मंजिल को पाता है। इन दिनों राजधानी दून में नगर निगम की जल्दबाजी खासी चर्चा का विषय बनी हुयी है। नगर निगम ने जो जल्दबाजी की वह लाईसेंस फीस के ऊपर है। अभी हाल ही में नगर निगम के द्वारा शहर में 111 तरह के व्यवसाय पर लाईसेंस शुल्क लगाने का एक प्रस्ताव तैयार किया था। यह प्रस्ताव अस्तित्व में आता उससे पहले ही समाचारो की सुर्खियां बन गया। फिर क्या था विरोध के नारे बुलंद हुए। नारे लगाने वाले सत्तारूढ पार्टी के अपने ही नेता थे। भारतीय जनता पार्टी के बोर्ड वाले नगर निगम ने ही लाईसेंस फीस लगाने का निर्णय लिया और विरोध करने वाले व्यापारी भाजपा के ही पदाधिकारी थे। व्यापारी संगठनों से ताल्लुक रखने वाले भाजपाईयो ने दून बंद तक का ऐलान कर डाला था। नगर निगम प्रांगण वैसे तो हमेशा शांत रहा लेकिन लाईसेंस फीस के प्रस्ताव ने इस प्रांगण को अशांत कर दिया। राजनीतिक संगठनो के साथ-साथ व्यापारिक संगठनो के नारे यहां गुंजने लगे। मामला बढना शुरू हुआ तो मेयर ने अपने कदम पीछे खींचना ही बेहतर समझा। आनन फानन में लाईसेंस फीस लागू न करने का निर्णय लिया गया। छोटी सरकार के मुखिया ने निर्णय तो ले लिया लेकिन वह अपने ही पार्षदो की आंखो की किरकिरी बन गए। लाईसेंस फीस लगाये तो व्यापारियो से दुश्मनी और वापस ले तो अपने ही पार्षद मुखालफत में मोर्चा खोल रहे हैं। मेयर ऐसे घिरे की न इधर चैन न उधर। पार्षद हैं कि अपने कदम पीछे लेने का नाम नही ले रहे। शहर में 111 तरह के व्यवासय पर लाईसेंस शुल्क लगाने और विरोध के बाद उसे वापस लेने को लेकर दिखायी गयी जल्दबाजी पर भाजपा के पार्षदो ने नाराजगी जतायी और तो और नगर आयुक्त से मुलाकात कर यहां तक कह डाला कि निगम प्रशासन को लाईसेंस शुल्क का यह मामला पहले निगम की कार्यकारिणी बैठक में रखना चाहिए था वहां मंजूरी के बाद यह मामला बोर्ड बैठक में जाता और बोर्ड बैठक द्वारा मंजूरी के बाद इसे लागू किया जाना चाहिए था। पार्षदो ने यहां तक कह डाला कि ऐसी जल्दबाजी से निगम की छवि धूमिल हुयी है। जिस तरह से शहर में हर तरह के व्यवसाय पर भारी भरकम लाईसेंस शुल्क तय किया इससे लोगो को नगर निगम को आडे हाथो लेने का मौका मिल गया। पार्षदो को भी लोगो की खरी खोटी सुननी पडी। यदि इस तरह का कोई फैसला लेना था तो यह मामला नगर निगम की कार्यकारिणी समिति की बैठक में लाया जाना था जिससे चर्चा हो पाती पर बिना कार्यकारिणी समिति की बैठक मे लाए लाईसेंस शुल्क की दरे सार्वजनिक कर उन पर आपत्ति मांग ली गयी। इससे व्यापारियो के बीच गलत संदेश गया। जिससे व्यापारी नाराज होकर सडक पर उतरे। एक गलत फैसले ने पार्षदो को भी सुनने के लिए मजबूर कर दिया। पार्षदो की यह नाराजगी लाईसेंस शुल्क वापस लेने का कारण है या फिर इसके पीछे कोई और राजनीति है। यह तो भाजपा के पार्षद ही जाने। लेकिन इतना जरूर है कि नगर निगम की राजनीति अब अपनी ही पार्टी के गले नही उतर पा रही है। राजधानी की सडको मंे एक भाजपा से जुडे व्यापारी नेता के होर्डिंग्स भी राजनीति को हवा दे रहे है। इन होर्डिंग्स में भाजपा नेताओ की फोटो लगी हुयी है। जिस पर लाईसेंस शुल्क वापस लेने के फैसले पर मेयर सुनील उनियाल गामा का धन्यवाद अदा किया गया है। होर्डिंग्स को पढकर ऐसा लगता है कि लाईसेंस शुल्क शहर में लागू हो गया था जिसे वापस लिया गया जबकि सच्चाई यह है कि लाईसेंस शुल्क अभी लागू नही हुआ था इसका केवल प्रस्ताव बनाया गया था। जब कोई  निर्णय लागू ही नही हुआ तो उसे वापस लेने का सवाल ही नही उठता। तो फिर श्रेय लेने की होड क्यांे शुरू हो गयी?

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