Sat. Jan 25th, 2020

खतरा बनते झोला छाप डाक्टर

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देहरादून। एक तरफ सरकार नर्सिंग होम- अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए उत्तराखण्ड राज्य में क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट लागू करने की बात कहती है वहीं दूसरी ओर राजधानी दून सहित अन्य जनपदों में झोलाछाप डाक्टरो की बाढ आ गयी है। गली मौहल्लो में बेधडक बिना रजिस्टेªशन डाक्टरो की दुकाने चलायी जा रही है। जिन जिम्मेदार अधिकारियों को इन पर कार्यवाही करनी है वह अपने कार्यालयों में चिर निद्रा सो रहे हैं जिसका परिणाम अनेको जिंदगियां खतरे में पडती हुयी सामने आ रही है। बात केवल दून शहर की नही है बल्कि अन्य शहरो में भी स्थिति एक जैसी है, लेकिन राजधानी होने के नाते दून में झोलाछाप डाक्टरो की बाढ कही न कही सरकार के साथ-साथ स्वास्थ्य महकमे की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है। कमाल की बात तो यह है कि बिना किसी डिग्री के डाक्टर की दुकाने खोलकर बैठने वाले लाईलाज बिमारियों का भी शर्तिया इलाज का दावा करते हैं और उनके दावे के आगे भोले भाले लोग अपनी जान इन झोलाछाप डाक्टरो के हवाले कर देते हैं। शहर के कई क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां मेडिकल स्टोर की क्लीनिक बनाकर वहां बिना डिग्री के कथित डाक्टर इलाज करते हुए देखे जा सकते हैं। जब बीमार व्यक्ति की हालत ज्यादा खराब हो जाती है तो कथित डाक्टर उन्हें सरकारी चिकित्सालयो के लिए रैफर कर देते हैं। हालत बद से बदत्तर होने के कारण सरकारी चिकित्सालय के चिकित्सक भी हाथ खडे कर देते हैं और एक जान आसायिक मौत का ग्रास बन जाती है। जान चाहे गरीब की हो या अमीर की वह अनमोल होती है। एक व्यक्ति के पीछे उसका पूरा परिवार टूट जाता है और झोलाछाप डाक्टर किसी और को अपना शिकार बनाने में जुट जाता है। स्थिति फिर दोबारा पहले जैसी हो जाती है। आखिर बार-बार झोलाछाप डाक्टर लोगो की अनमोल जान को खतरा बने रहते है लेकिन स्वास्थ्य महकमा है कि अपनी चिर निद्रा को तोडने का नाम नही लेता। अधिकारी तक यह बताने में सफल नही होते ही आखिर उन्होने बिना रजिस्टेªशन एवं बिना डिग्री के डाक्टरो की दुकाने चलाने वालो पर क्या कार्यवाही की है। कमाल तो यह भी है कि संबंधित विभाग के अधिकारियो के पास इतना भी समय नही है कि वह फर्जी क्लीनिको पर छापेमारी करे। देहरादून शहर के अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां व्यस्तम मार्ग पर झोलाछाप डाक्टरो की दुकाने चल रही हैं और इन मार्गाे पर सरकार के मंत्रियो से लेकर स्वास्थ्य महकमे के अधिकारियो का आना जाना लगा रहता है किंतु वह झोलाछाप डाक्टरो की दुकानो को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। फर्जी डाक्टरो की दुकाने आम जन को तो दिखायी देती है लेकिन जिम्मेदार अधिकारियो को यह दिखायी क्यो नही देती। कही ये तो नही कि अधिकारियों के पास पहले ही चढावा पहंुच जाता हो। यदि ऐसा है तो स्थित बहुत ज्यादा भयावह है। हम यह नही कहते कि सारे अधिकारी भ्रष्ट हैं लेकिन एक खराब मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। फिर चाहे फर्जी डाक्टरो का चढावा अधिकारियो के पास पहुंच रहा हो या फिर किसी कर्मचारी के पास, लेकिन स्थिति तो खराब है ही। यदि स्वास्थ्य महकमा ईमानदार है तो फर्जी डाक्टरो पर लगाम क्यो नही कसी जा रही। यह अपने आप में यक्ष प्रश्न बना हुआ है। 

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