Wed. Nov 13th, 2019

गलत नीतियों की भेंट चढा दून चिकित्सालय

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देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य में अजीबों गरीब निर्णय राज्य गठन के बाद से होते रहते हैं। कई बार सरकार को अपने निर्णय बदलने व वापस भी लेने पडते हैं। कई बार सरकार ऐसे कदम उठा लेती है जो आम जन पर भारी पडते हैं। ऐसा ही एक निर्णय पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के दौरान लिया गया था। यह निर्णय सीधे-सीधे गरीब एवं मध्यम वर्ग के स्वास्थ्य से जुडा हुआ था। जब सरकार जन विरोधी निर्णय ले रही थी उस समय किसी भी पार्टी एवं संगठन ने इसका विरोध नही किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सरकार को अपनी गलती का जरा भी एहसास नही हुआ। आज भी प्रदेश में भाजपा की सरकार है और सरकार की बागडोर वरिष्ठ भाजपा नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत के हाथो में है। त्रिवेंद्र सिंह रावत आम जन के दुख दर्द को महसूस करने वाले हैं और उनसे अब यह उम्मीद की जा रही है कि वह आम जन की पीडा को समझते हुए उस गलती का सुधार करें जो उन्हीं के सहयोगी नेताओं द्वारा पूर्व में की गयी थी। यह गलती दून चिकित्सालय को मेडिकल कालेज बनाने की है। न सिर्फ दून चिकित्सालय बल्कि दून महिला चिकित्सालय को भी मेडिकल कालेज से जोड दिया गया था। मेडिकल कालेज का अंग बनते ही दून महिला चिकित्सालय की उल्टी गिनती शुरू हो गयी। जिसका परिणाम आज गर्भवती महिलाओं एवं नवजात शिशुओ की जान पर बन रही घटनाओ के रूप में सामने आ रहा है। इतना ही नहीं दून को राजधानी बनने का गौरव तो प्राप्त हुआ लेकिन उससे जिला चिकित्साल छीन गया। राज्य गठन को 18 वर्ष हो चुक हैं और शायद यह 18 वर्ष आम जन को जितनी खुशी देने वाले थे उतनी ही पीडा उन लोगो को हुयी जो जिला चिकित्सालय पर निर्भर थे इनमें बडी संख्या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग एवं मध्यम वर्ग की है। दून चिकित्सालय रहते हुए ऐसा कोई दिन नही जाता था जब वहां की ओपीडी में हजारो की संख्या में बीमार लोग नही आते थे। दून चिकित्सालय में एक से बढकर एक बेहतर चिकित्सक थे जो बिमारी को समझते हुए उसका बेहतर उपचार करते थे। दून चिकित्सालय कितना जरूरी था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय पर्वतीय जिलो के लगभग 80 से 90 प्रतिशत केस रेफर होकर दून चिकित्सालय आते थे। इतना ही नही बल्कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्रफरनगर, बिजनौर से भी बडी संख्या में लोग उपचार कराने दून चिकित्सालय आते थे। उस समय दून चिकित्सालय में डा- के-पी- जोशी, एन-एस- बिष्ट, डा- डी-पी- जोशी, डा- तेवतिया, डा- के-सी- पंत, डा- बी-सी- पाठक सहित अन्य चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रहे थे। जब दून चिकित्सालय को मेडिकल कालेज बनाया तो यहां तैनात चिकित्सको का बडी संख्या में स्थानांतरण कर दिया गया और जो चिकित्सक नयी नियुक्ति पर नही गया उन्होंने वीआरएस ले लिया। डा- केपी जोशी इस समय अपना निजी चिकित्सालय चला रहे हैं। कुल मिलाकर बात दून चिकित्सालय की हो रही है यह चिकित्सालय अब इतिहास के पन्ने में दर्ज है, क्योंकि दून चिकित्सालय के स्थान पर सरकार ने दून राजकीय मेडिकल कालेज बना दिया है। मेडिकल कालेज में कैसी सुविधाएं प्राप्त हो रही है इसका अंदाजा लगाया जाना हो तो उसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। जिस मेडिकल कालेज में आपात काल के समय किसी व्यक्ति को सही इंजेक्शन तक नही लगाया जा रहा तो सोचिए बडी बिमारी का कैसे इलाज हो रहा होगा। सरकार ने दून चिकित्सालय को मेडिकल कालेज तो बना दिया लेकिन यह नही सोचा कि जिला चिकित्सालय कहां होगा। कभी कोरोनेशन को जिला चिकित्सालय बनाने की बात कही जाती है तो कभी इस मामले को ठंडे बस्ते में पहुंचा दिया जाता है। सरकार की अपनी एक निति होती है कि जब किसी चीज को उजाडा जाता है तो उससे पहले उसे दूसरी जगह पर बसाने की नीति तैयार की जाती है लेकिन दून चिकित्सालय को उजाडने से पहले उसे बसाने की सरकार ने नही सोची जिसका खामियाजा आम जन का भुगतना पड रहा है। अब आम जन में एक ही चर्चा है कि यदि जिला चिकित्सालय वापस चाहिए तो इसके लिए एक बडा आंदोलन खडा करना पडेगा तभी सोई सरकार जागेगी।

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