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आरुषि-हेमराज हत्याकांड: यदि तलवार दंपत्ति निर्दोष तो फिर हत्यारा कौन?

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न्यायमूर्ति बीके नारायण और एके मिश्र की पीठ ने आरुषि-हेमराज हत्या के मामले में राजेश और नुपूर तलवार को बरी कर दिया। खंडपीठ तलवार जोड़ी को संदेह का लाभ देने के फैसले पर पहुंची।

उच्च न्यायालय की अपील में हत्या के मकसद पर प्रमुख तर्क शामिल थे, जो थोड़ा असामान्य है। आपराधिक मामलों में मकसद अभियुक्त के अपराध का निर्धारण करने के लिए प्रासंगिक नहीं है, यह केवल सज़ा की मात्रा तय करने के लिए प्रासंगिक है।

मामले में पहले तीन पूर्ण जांच सामने आई थी। पहली उत्तर प्रदेश पुलिस और दूसरी दो केंद्रीय जांच ब्यूरो ने की थी। केवल दूसरी जांच ने इस दंपति को बरी किया और बाकी दो ने दोहरी हत्या के आरोप लगाए। यह वास्तव में अजीब है कि तीसरी जांच सीबीआई द्वारा ही थी, जिसने तलवार जोड़ी पर दोहरी हत्या के लिए आरोप लगाया था।

भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था एक आरोपी-केंद्रित प्रक्रिया है न की पीड़ित-केंद्रित। इसका अर्थ है कि न्यायिक प्रक्रिया का फोकस केवल अभियुक्त के अपराध पर है न की आपराधिक कृत्य का वास्तविक अपराधी खोजने पर। इसका मतलब यह है कि इस फैसले के बाद, जब तक और फिर एक नई जांच न हो जाए, आरुषि और हेमराज का हत्यारा अज्ञात रहेगा।

इस मामले की जांच में नर्को-विश्लेषण परीक्षण आदि जैसे आधुनिक फोरेंसिक तकनीक भी शामिल थी। दुर्भाग्य से, इस तरह की तकनीकों द्वारा तैयार किए गए सबूत भारतीय अदालतों की आंखों में विवादास्पद हैं और परिणामस्वरूप, अदालत ने ऐसे साक्ष्य स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की वर्तमान स्थिति के लिए दुखद है। जहां एक बहुत ही उच्च प्रोफ़ाइल वाले मामले में, तीन जांच के बाद, जिसमें से दो को देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई द्वारा किया गया था, और लगभग एक दशक बाद, अपराध का अपराधी सुरक्षित रहता है।

यह हास्यपाद है कि राज्य और केंद्र की जांच एजेंसियों से, उनकी सभी शक्तियों का प्रयोग किए जाने के बावजूद, एक डबल हत्या का मामला हल नहीं हो सका।

आवश्यकता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में एक गंभीर सुधार किया जाय।

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